!! ॐ नमः शिवायः !!
ये देश आखिर जा किधर रहा है ?
समलैंगिकता संबंधी उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर कई नामीगिरामी हस्तियों के विचार जानने को मिल रहे हैं । फिल्मी स्टारों तक ही नहीं अभी अभी एक शीर्ष राजनेता / नेताइन की भी राय पढ़ी गयी। इन सबको दुख हुआ जान कर की सूप्रीम कौर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी मे दुबारा प्रतिस्थापित कर दिया ।
मानव अपने को आदिम युग से निकाल कर अपने को संवर्धित करते हुए विभिन्न संस्कारों के निर्माण और उसको कड़ाई से religiously पालन करते हुए ही तो समाज को रहने लायक और सर्वसम्मत स्वरूप मे दे पाया ....लगभग पूरे विश्व के देशों मे यौनाचरन संबंधी अनुमति एवं वर्जनाएं लगभग एक ही हैं । तभी विश्व का समाज यहाँ तक पहुँच पाया है । अब इस मूल तन्तु को यह मानव स्वयं ही तोड़ना चाहता है.... और क्या पुनः उसी आदम युग मे पहुचना चाहता है ? बहाना मानवाधिकार का, व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की ?
देश का संविधान हमने स्वयं बनाया और उसको स्वयं स्वीकार किया...... वही सबके लिया कानून बन गया ( इसको ही संस्कारित कहा जाता है - यह राष्ट्रीय संस्कार है ) । अब इस कानून के हिसाब से, उदाहरण लें , चोरी अपराध है, डकैती, बलात्कार इत्यादि अपराध है । आदम जमाने से चोरी , डकैती हो रही है , कोई इसे रोक तो पा नहीं रहा है । तो क्या इसे भी अपराध की श्रेणी से मुक्त कर दिया जाय ? क्यूँ की चोर जी के यह व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की और उनके मानवाधिकार का हनन है ? वेश्यावृत्ति को इस लिए कानूनी मान्यता दे जाय क्यूँ की यह सदियों से चल रही है और कोई इसे अब तक खतम तो कर नहीं पाया ! बालात्कार कॉ भि कानूनी मान्यता दे ही दिया जाय क्यू की समलैंगिकता से अधिक घटनाएँ बलात्कार की समाज मे होती रही हैं और होगी भी जिससे सख्ती से , जागरूक करके निपटाना होगा..... तो क्या उसे भी कानूनी अनुमाती दे ही दिया जाय ? adultry and incest ( हिन्दी मे यह शब्द लिखने की भी साहस नहीं जुटा पा रहा हूँ ) निषिद्ध हैं । यह सभी संबंध व्यक्तिगत सहमति से और चारदीवारी के अंदर ही होते हैं । तो क्या इन्हें भी मान्यता मिल जाना चाहिए ? आखिर यह तथाकथित मानवाधिकार और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का मसला है ? वैसे ही है समलैंगिकता । यह स्वस्थ यौनाचरन मे नहीं आता यह बात कौन अस्वीकार कर सकता है ? सदियों से बहुत सारी बुराइयाँ समाज मे हैं.... इसी लिए तो सांस्कारिक बंधन व अनुशाशन बनाए गए । स्वस्थ , प्रकृतिक , सौम्य यौनाचरण को सर्वग्राह्यता दी गयी संसकारयुक्त किया गया । और अप्राकृतिक / वृत्तिक ( वेश्यावृत्ति इत्यादि ) / विकृत यौन आचरण जो उन दिनों भी व्याप्त था , उन पर अंकुश भी लगाने के लिए बंधन लगाए गए , उसे संस्कार विहीन कहा गया। विवाह नामक संस्था स्थापित किया गया । संस्कार शब्द और कानून शब्द दोनों का अर्थ एक ही होता है ..... एक धार्मिक / सामाजिक अनुशासन मे तो दूसरा सरकारी अनुशासन शब्दावली में प्रयोग होता है। तो, संस्कार /कानून बनाए ही इसी लिए गए हैं कि ऐसे भी लोग हैं जो अनुपालन नहीं करने कि प्रवित्ति वाले हैं ..... तो उनके लिए दंड का भी प्रावधान है ...... समाज तंत्र मे भी और देश के सरकारी तंत्र मे भी। अन्यथा जिस समाज / देश की जिस अवधारणा की परिकल्पना की गयी है वही विखंडित हो जाता है ।
अपने राष्ट्र की बात लें तो यह देश अपने धार्मिक सामाजिक संस्कारों , और शुचिता के लिए सदैव से ही विश्व मे प्रशंसनीय और अग्रणी रहा है, विश्व के सभी राष्ट्र आध्यात्मिक नेतृत्व के लिए भारत की ओर देखते हैं । और अब हमारे अगुआ लोग ही यह क्या करने पर उतारू हो गए हैं ? समलैंगिकता को मान्यता देने और उसे कानूनी जामा भी पहना देने के लिए जय राम रमेश कपिल सिब्बल चिदम्बरम सोनिया - रहूल गांधी जैसे लोग सामने आ गए हैं ...... आमिर खान , अनुपम खेर , सलीना जेटली , अनुष्का शर्मा , कारण जौहर इत्यादि फिल्मी लोग भी समलैंगिकता के समर्थन मे बयान दिये हैं । फिल्मी लोगों की बात का तो चलो बुरा नहीं मानना चाहिए ये लोग तो हैं ही भांड और बाइयाँ जिनका काम ही मनोरंजन करना है। पर संसद मे बैठे लोग, जिनका धर्म है राष्ट्र की गरिमा ,राष्ट्र की मुख्य धारा , सदविचार और जीवन पद्धति का संरक्षण, वही यह क्या कर रहे हैं ? सूप्रीम कोर्ट का आदेश भी नहीं मान रहे है ... ? तो फिर उच्चतम न्यायालय का अर्थ ही क्या रह जाएगा ? आपने बहुत पढ़ा सुना होगा की भारत राष्ट्र को मानसिक गुलाम बनाने के लिए शिक्षा व्यवस्था अंग्रेजों (मैकाले पद्धति ) ने बदली जिसे स्वतन्त्रता के बाद भी आज तक ठीक नहीं किया गया....चिंतक लोग हमेशा डरते रहे की आने वाली नयी पौध देश का सत्यानाश कर देगी ....... तो लो आ गयी पौध और अब पूरा वृक्ष बन चुकी है। उच्चतम न्यायालय के निर्णय को पूरा पढ़ें आप तभी जान पाएंगे की कितनी सही बात काही है !! प्रत्येक संवेदनशील भारतवासी उच्चतम न्यायालय का आभारी है और कृतज्ञ है की ऐसा निर्णय दिया।
प्रार्थना है उन सनकी , मूढ़ , स्वार्थी , विकृत मानसिकता वाले बंधु / भगिनियों से जो ऐसे प्रतिष्ठित जगह पर पहुच गए है कि उनकी आवाज दूर तक पहुँचती है .... कि कृपया अपनी विकृत मानसिकता अपने तक ही सीमित रक्खें और नए नए fashnable शब्द "मानवाधिकार" कि आड़ मे समूची मानवता का विनाश करने से बचें । कई कई हजारो वर्ष लगे हैं इस सभ्यता के विकास में ।
_/\_
!! ॐ नमः शिवायः !!
P.S. : हाँ , "समलैंगिकता" जैसी अपराध की प्रकृति के दृष्टिगत धारा 377 मे इसके लिए दंड प्रविधान मे संशोधन अवश्य किया जा सकता है.......सामाजिक / नैतिक दंड के साथ heavy फ़ाइन वगैरह होना चाहिए । जेल वेल पर सोचा जा सकता है .....कोई आवश्यकता नहीं रह जाएगी यदि सामाजिक / नैतिक दंड मिलेगा तो.........
ये देश आखिर जा किधर रहा है ?
समलैंगिकता संबंधी उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर कई नामीगिरामी हस्तियों के विचार जानने को मिल रहे हैं । फिल्मी स्टारों तक ही नहीं अभी अभी एक शीर्ष राजनेता / नेताइन की भी राय पढ़ी गयी। इन सबको दुख हुआ जान कर की सूप्रीम कौर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी मे दुबारा प्रतिस्थापित कर दिया ।
मानव अपने को आदिम युग से निकाल कर अपने को संवर्धित करते हुए विभिन्न संस्कारों के निर्माण और उसको कड़ाई से religiously पालन करते हुए ही तो समाज को रहने लायक और सर्वसम्मत स्वरूप मे दे पाया ....लगभग पूरे विश्व के देशों मे यौनाचरन संबंधी अनुमति एवं वर्जनाएं लगभग एक ही हैं । तभी विश्व का समाज यहाँ तक पहुँच पाया है । अब इस मूल तन्तु को यह मानव स्वयं ही तोड़ना चाहता है.... और क्या पुनः उसी आदम युग मे पहुचना चाहता है ? बहाना मानवाधिकार का, व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की ?
देश का संविधान हमने स्वयं बनाया और उसको स्वयं स्वीकार किया...... वही सबके लिया कानून बन गया ( इसको ही संस्कारित कहा जाता है - यह राष्ट्रीय संस्कार है ) । अब इस कानून के हिसाब से, उदाहरण लें , चोरी अपराध है, डकैती, बलात्कार इत्यादि अपराध है । आदम जमाने से चोरी , डकैती हो रही है , कोई इसे रोक तो पा नहीं रहा है । तो क्या इसे भी अपराध की श्रेणी से मुक्त कर दिया जाय ? क्यूँ की चोर जी के यह व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की और उनके मानवाधिकार का हनन है ? वेश्यावृत्ति को इस लिए कानूनी मान्यता दे जाय क्यूँ की यह सदियों से चल रही है और कोई इसे अब तक खतम तो कर नहीं पाया ! बालात्कार कॉ भि कानूनी मान्यता दे ही दिया जाय क्यू की समलैंगिकता से अधिक घटनाएँ बलात्कार की समाज मे होती रही हैं और होगी भी जिससे सख्ती से , जागरूक करके निपटाना होगा..... तो क्या उसे भी कानूनी अनुमाती दे ही दिया जाय ? adultry and incest ( हिन्दी मे यह शब्द लिखने की भी साहस नहीं जुटा पा रहा हूँ ) निषिद्ध हैं । यह सभी संबंध व्यक्तिगत सहमति से और चारदीवारी के अंदर ही होते हैं । तो क्या इन्हें भी मान्यता मिल जाना चाहिए ? आखिर यह तथाकथित मानवाधिकार और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का मसला है ? वैसे ही है समलैंगिकता । यह स्वस्थ यौनाचरन मे नहीं आता यह बात कौन अस्वीकार कर सकता है ? सदियों से बहुत सारी बुराइयाँ समाज मे हैं.... इसी लिए तो सांस्कारिक बंधन व अनुशाशन बनाए गए । स्वस्थ , प्रकृतिक , सौम्य यौनाचरण को सर्वग्राह्यता दी गयी संसकारयुक्त किया गया । और अप्राकृतिक / वृत्तिक ( वेश्यावृत्ति इत्यादि ) / विकृत यौन आचरण जो उन दिनों भी व्याप्त था , उन पर अंकुश भी लगाने के लिए बंधन लगाए गए , उसे संस्कार विहीन कहा गया। विवाह नामक संस्था स्थापित किया गया । संस्कार शब्द और कानून शब्द दोनों का अर्थ एक ही होता है ..... एक धार्मिक / सामाजिक अनुशासन मे तो दूसरा सरकारी अनुशासन शब्दावली में प्रयोग होता है। तो, संस्कार /कानून बनाए ही इसी लिए गए हैं कि ऐसे भी लोग हैं जो अनुपालन नहीं करने कि प्रवित्ति वाले हैं ..... तो उनके लिए दंड का भी प्रावधान है ...... समाज तंत्र मे भी और देश के सरकारी तंत्र मे भी। अन्यथा जिस समाज / देश की जिस अवधारणा की परिकल्पना की गयी है वही विखंडित हो जाता है ।
अपने राष्ट्र की बात लें तो यह देश अपने धार्मिक सामाजिक संस्कारों , और शुचिता के लिए सदैव से ही विश्व मे प्रशंसनीय और अग्रणी रहा है, विश्व के सभी राष्ट्र आध्यात्मिक नेतृत्व के लिए भारत की ओर देखते हैं । और अब हमारे अगुआ लोग ही यह क्या करने पर उतारू हो गए हैं ? समलैंगिकता को मान्यता देने और उसे कानूनी जामा भी पहना देने के लिए जय राम रमेश कपिल सिब्बल चिदम्बरम सोनिया - रहूल गांधी जैसे लोग सामने आ गए हैं ...... आमिर खान , अनुपम खेर , सलीना जेटली , अनुष्का शर्मा , कारण जौहर इत्यादि फिल्मी लोग भी समलैंगिकता के समर्थन मे बयान दिये हैं । फिल्मी लोगों की बात का तो चलो बुरा नहीं मानना चाहिए ये लोग तो हैं ही भांड और बाइयाँ जिनका काम ही मनोरंजन करना है। पर संसद मे बैठे लोग, जिनका धर्म है राष्ट्र की गरिमा ,राष्ट्र की मुख्य धारा , सदविचार और जीवन पद्धति का संरक्षण, वही यह क्या कर रहे हैं ? सूप्रीम कोर्ट का आदेश भी नहीं मान रहे है ... ? तो फिर उच्चतम न्यायालय का अर्थ ही क्या रह जाएगा ? आपने बहुत पढ़ा सुना होगा की भारत राष्ट्र को मानसिक गुलाम बनाने के लिए शिक्षा व्यवस्था अंग्रेजों (मैकाले पद्धति ) ने बदली जिसे स्वतन्त्रता के बाद भी आज तक ठीक नहीं किया गया....चिंतक लोग हमेशा डरते रहे की आने वाली नयी पौध देश का सत्यानाश कर देगी ....... तो लो आ गयी पौध और अब पूरा वृक्ष बन चुकी है। उच्चतम न्यायालय के निर्णय को पूरा पढ़ें आप तभी जान पाएंगे की कितनी सही बात काही है !! प्रत्येक संवेदनशील भारतवासी उच्चतम न्यायालय का आभारी है और कृतज्ञ है की ऐसा निर्णय दिया।
प्रार्थना है उन सनकी , मूढ़ , स्वार्थी , विकृत मानसिकता वाले बंधु / भगिनियों से जो ऐसे प्रतिष्ठित जगह पर पहुच गए है कि उनकी आवाज दूर तक पहुँचती है .... कि कृपया अपनी विकृत मानसिकता अपने तक ही सीमित रक्खें और नए नए fashnable शब्द "मानवाधिकार" कि आड़ मे समूची मानवता का विनाश करने से बचें । कई कई हजारो वर्ष लगे हैं इस सभ्यता के विकास में ।
_/\_
!! ॐ नमः शिवायः !!
P.S. : हाँ , "समलैंगिकता" जैसी अपराध की प्रकृति के दृष्टिगत धारा 377 मे इसके लिए दंड प्रविधान मे संशोधन अवश्य किया जा सकता है.......सामाजिक / नैतिक दंड के साथ heavy फ़ाइन वगैरह होना चाहिए । जेल वेल पर सोचा जा सकता है .....कोई आवश्यकता नहीं रह जाएगी यदि सामाजिक / नैतिक दंड मिलेगा तो.........
.......... अरुण कुमार मिश्र
दिसंबर १२ , वृहस्पतिवार - २०१३
